
हाल के समय में बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हो रहे अत्याचारों ने पूरे क्षेत्र की अंतरात्मा को झकझोर दिया है। निर्दोष नागरिकों पर हिंसा, भय और असुरक्षा का माहौल किसी भी सभ्य समाज के लिए अस्वीकार्य है। भारत, जिसकी सभ्यता सहिष्णुता और मानवता पर आधारित है, ऐसे कृत्यों को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता—न तो नैतिक रूप से, न ही कूटनीतिक रूप से।
हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि भारत में हिंदू राष्ट्र की मांग नफरत या बहिष्कार की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण, सभ्यतागत पहचान और संवैधानिक मूल्यों की दृढ़ता की मांग है। हिंदू दर्शन का मूल—वसुधैव कुटुम्बकम—सबके सम्मान और सहअस्तित्व की बात करता है। इसी मूलभाव के साथ, हिंदू राष्ट्र की अवधारणा भारत की प्राचीन सांस्कृतिक निरंतरता, परंपराओं और नैतिक ढांचे को सुदृढ़ करने का आह्वान है।
हम भारत सरकार से निम्नलिखित मांगें रखते हैं:
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर सख्त और स्पष्ट कूटनीतिक रुख अपनाया जाए तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा प्रभावी ढंग से उठाया जाए। भारत में लोकतांत्रिक, अहिंसक और संवैधानिक अभियान चलाकर हिंदू सभ्यता, संस्कृति और अधिकारों के संरक्षण पर राष्ट्रीय विमर्श को मजबूती दी जाए।
सीमा-पार मानवाधिकार उल्लंघनों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव तंत्र सक्रिय किया जाए और पीड़ितों के लिए न्याय की मांग की जाए।
देश के भीतर सांस्कृतिक विरासत, शिक्षा और सामाजिक समरसता को सशक्त करने वाली नीतियों को प्राथमिकता दी जाए। यह अभियान किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत आत्मा की रक्षा के लिए है। हिंदू राष्ट्र की आवश्यकता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत की बहुसंख्यक सांस्कृतिक पहचान को सम्मान देता हुआ सभी नागरिकों के अधिकारों की समान रक्षा सुनिश्चित करता है।
हम दो टूक शब्दों में कहते हैं—धर्म के नाम पर अत्याचार स्वीकार्य नहीं। भारत को न केवल अपने नागरिकों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए, बल्कि पड़ोस में हो रहे अन्याय के विरुद्ध नैतिक नेतृत्व भी दिखाना चाहिए। न्याय, सुरक्षा और सांस्कृतिक सम्मान—यही भारत की शक्ति है, यही हमारी मांग है।